ब्रह्मचर्य की ताकत

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मूलाधार :-

कामवासना :—
जब काम वासना जकड़ें तो किया करें।
मूल बांधिये वो जो मूलाधार चक्र हैं। जहॉं से कामऊर्जा बनती हैं। उसे बांध लेना हैं। हमारें भारत में मूल को बॉधने की बहुत सी प्रक्रिया खोजी गई हैं जो लाखों साल पुरानी है। मूल को बॉंधने की।
जैसे — योग, हठयोग, ऋषि पंतजलि के उपाय!

मूल जब बॅंध जाता हैं तो ऊर्जा अपनेआप ऊपर हुठने लगती हैं। क्योंकि नीचे का द्वार बंद/अबरूद्ध हो जाता है।
एक छोटा सा प्रयोग करें। जब भी तुम्हारे मन में कामवासना हुठे तो, तब डरों मत एक दम शान्त होकर बैठ जाओं और नाक से जोर से श्वस बाहर छोड़े,
श्वास को अन्दर मत लों क्योंकि जैसे ही आप श्वास को अन्दर लेते हो वो कामऊर्जा को नीचे की ओर धकेलती है।
श्वास को बाहर छोड़ते समय अपनी नाभी कों अन्दर की ओर खिचों। और श्वास को बाहर फेकों जितनी जोर से फेंक साकों।
धीरे—धीरे इसका अभ्यास होने पर आप सम्पूर्ण रूप से श्वास को बाहर फेंकने में सफल हो जाओंगे।
जब सारी श्वास बाहर हो जाती है। तब हमारा पेट और नाभि शून्य/(Vaccum) हो जाता है।
और जहॉं कही शून्य हो जाता है उसके आस—पास की ऊर्जा शून्य की और प्रभाहित होने लगती है। शून्य खींचता है। क्योंकि प्रकृति शून्य को बर्दाश्त नही करती और शून्य को भरती हैं।
जैसे — आप नदीं के किनारे से घड़ें को भरिये। जैसे ही आप उस घड़ें को भरकर उठाते है तब उस जगह गड्ढा हो जाता है। और तभी चारो ओर का पानी दौड़कर उस गड्ढा को फिर से पूरा भर देता है।

इसी तरह आपकी नाभि के पास शून्य हो ता जायें तो मूलाधार से ऊर्जा नाभी की ओर ऊठ जाती है। और आपको बड़ा रस मिलेगा और आप पहली बार अनुभव करोगें के एक गहन ऊर्जा बांण की तरहा आके आपकी नाभि में ऊठ गई। आप पायेगे के सारा तन—मन एक गहन स्वास्थ्य से भर गया।

एक ताजगी!
इस ताजगी का अहसास ठीक वैसा ही होगा जैसा संभोग के बाद उदासी का होता है।
जैसे ऊर्जा कें स्खलन के बाद एक ​शिथिलता पकड़ लेती हैं, एक रूग्ण दशा, एक विषाद, एक हारा हुआ, एक थकान, और आप सो जाना चाहते हो।

बहुत से लोग तो संभोग का उपयोग सिर्फ निंद के लिए करते है, क्योंकि थक जाते हैं। यूरोप और अमरिका के डॉक्टर तो सलाह देते हैं कि जिनको निंद नही आती वो संभोग (Sex) करें।
संभोग कर लोगे थक जाओंगे, टूट जाओंगे नींद अपनेआप आ जायेंगी। लेकिन वो नींद कोई स्वस्थ्य नींद नहीं है। वो थकान की नींद है। वो विश्राम नहीं हैं वो थकान है। थकान और विश्राम में बहुत फर्क हैं।

विश्राम में ऊर्जा पूरी आराम करती हैं।
थकान में कोई ऊर्जा नहीं होती उसमें तो आप सिर्फ हारे—टूटें पड़ जातें हो।

संभोग के बाद जैसे विषाद का अनुभव होगा, वैसे ही अगर ऊर्जा नाभि की तरफ ऊठ जायें। तो आपकों हर्ष का अनुभव होगा। एक प्रफुल्लता घेर लेगी। ऊर्जा का रूपान्तरण शुरू होगा। तुम ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा सौमनस्य पूर्ण, ज्यादा उत्फुल्ल, हो उठोगे।
अन्त में विश्रामपूर्ण मालूम पड़ोंगे। जैसे गहरी नींद के बाद ऊठे हो।  ताजगी का गहन अनुभव होगा।।

ऊर्जा का ऊद्र्धगमन बड़ा अनूठा अनुभव है।

और पहला अनुभव होता है जब मूलाधार से नाभि की तरफ संक्रमण होता हैं। ये मूलबंद की सहजतम प्रक्रिया है। कि तुम श्वास को बाहर फेंक दों नाभि शून्य हो जायेगी। और ऊर्जा उठेगी नाभि की तरफ और मूलद्वार अपने आप बन्द हो जायेगा। और वो द्वार खुलता हैं ऊर्जा के धक्के से, जब ऊर्जा मूलद्वार पर नहीं रहती, धक्का नहीं लगेगा। तो मूलद्वार अपने आप बंद हो जाता हैं।

मूल बाधी सर गगन समाना!  बस आपनें एक बार सीख लिया की ऊर्जा नाभि तक आ जाये फिर शेष तुम्हें चिन्ता नहीं करनी। तुम्हारी ऊर्जा जब भी कामवासना में उठें उसे नाभि में एकत्रित करते जाओं। जैसे—जैसे ऊर्जा बढ़ेगी नाभि में अपनेआप ऊपर उठनें लगेगी।
जैसे— किसी बर्तन में पानी भरता जायेगा तो पानी की सतह अपनेआप ऊपर उठने लगेगी। असली बात मूलाधार का बंद हो जाना है। घड़ें के नीचे का छेद बंद हो गया तो घड़ा अपनें आप भरता जायेगा। एक दिन तुम अचानक पाओगें के धीरे—धीरे ऊर्जा नाभि के ऊपर आ रही हैं। तुम्हारा हृदय एक नई संवेदना से अप्लाबित हुआ जा रहा है। तुम कहते हो कि तुम प्रेम करते हों पर तुम कर नही सकतें क्योंकि तुम्हारे हृदय में ऊर्जा नहीं है। तुम लाख कहों के तुम प्रेम करते हो, पर तुम प्रेम कर नहीं सकतें। क्योंकि प्रेम तभी घटता हैं जब हृदय चक्र में ऊर्जा आती हैं। उसके पहले घटता नहीं। तो आप समझाते रहों अपने को, लेकिन तुमने किेसी को प्रेम नही किया। न अपनी पत्नी को न अपने बेटे को। ज्यादा से ज्यादा तुम अपने को प्रेम करते हो बाकि तुम किसी को प्रेम नही कर सकतें हों। और वो भी बहुत कमजोर हैं, वो भी कोई गहरा नही है।

जिस दिन तुम्हारी ऊर्जा हृदय चक्र पर आयेंगी तब तुम पाओगें के तुम भर गये प्रेम से। तुम जहॉ भी बैठोगें तुम्हारें चारो तरफ एक हवा वहने लगेगी प्रेम की। दूसरे लोग भी अनुभव करेंगे के तुममे कुछ बदल गया है। तुम अब वह नही हो जो पहले थे। तुम कोई और ही तरंग ले कर के आते हों, तुम्हारें साथ कुछ और ही लहर आती हैं कि उदास प्रसन्न हो जाता है, कि दुखी कुछ देर को दुख को भूल जाता हैं, और अशांत शात हो जाता हैं, कि तुम जहॉ छूॅं देते हो जिसे छूॅं देते हो उस पर ही एक छोटी सी वर्षा प्रेम की हो जाती है। लेकिन ऊर्जा जब तम्हारें हृदय में आयेगी ये तभी होगा।

और फिर ऊर्जा बढ़ेगी तो ये हृदय से कंठ में आयेगी। तब तुम्हारी वाणी में एक माधुरी आ जायेगी। जब तुम्हारी वाणी में एक सौदर्य आ जायेगा तब तुम साधारण से शब्द बोलोगे तो उन शब्दों में भी काव्य होगा। तुम दो शब्द किसी से कह दोगों उसे तृप्त कर दोगों। तुम चुप भी रहोगें तो तुम्हारें मौन में भी संदेश छुप जायेंगे। तुम न भी बोलोंगे तो भी तुम्हारा अस्तित्व बोलेगा। ऊर्जा कंठ पर आ गई, उपनिषद के गीत तभी तो फूटें होंगे। जब ऊर्जा कंठ पर आ गई होगी। बुद्ध के वचन तभी तो निसृत हुये होंगे, जब ऊर्जा कंठ पर आ गई होगी।

कुरान :—

कुरान के वचल साधारण है। लेकिन जब मोहम्मद ने उन्हें कहा था। तब उन वचनों में बात ही कुछ और थी। तब वे किसी और ही लोक से आते थें, तुम भी उन्हें दौहरा सकते हो। लेकिन तुम्हारी ऊर्जा जहॉं होगी उन शब्दों में वही गुण—धर्म प्रविष्टि हो जायेगी। अगर कामवासना से भरा हुआ व्याक्ति कुरान को कितनी ही तरन्नुम से गाए। तो भी वो कव्वाली ही होगी। वो कुरान हो नही सकती। क्योंकि कुरान का संबंध शब्दों से थोड़ी है। तुम्हारी जीवन ऊर्जा से है, और अगर मोहम्मद कव्वाली भी गाए तो वो कुरान हो जायेगी। उन शब्दों में भी नये भाव ​अभिभूत हो जायेगे। नई कोंपलें और नए फूल लग जायेंगे।

गीता :—

कृष्ण ने गीता कही।
वो कंठ से आई ऊर्जा की अभिव्यक्ति है, अभिव्यंजना है। कितने लोंगों ने गीता को कंठस्थ किया है, और कितने लोग उसका पाठ करते हैं, और कितने हजारों उसका पाठ कर चुके है। लेकिन अगर काम ऊर्जा मूलाधार से गिर रहीं है। तो गीता तुम गातें रहों वो गीता तुम्हारी ही होगी भगवात गीता नही हो सकती। भगवत गीता होने के लिए चेतना का भागवत होना जरूरी हैं।

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